Bol Bindas || “कर्मा”

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भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है कर्मा पूजा…..

विवेक चौबे की ✍️ से…..

 

Jharkhand/गढ़वा : कर्मा पर्व को आदिवासी संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व आदिवासी समाज का सबसे प्रचलित लोक पर्व है। भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है कर्मा पूजा। इस दिन बहनें अपने भाइयों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं। इस अवसर पर लोग प्रकृति की पूजा कर अच्छे फसल की कामना भी करते हैं। इस पर्व पर झारखंड के लोग ढोल व मांदर की थाप पर झूमते-गाते हैं। इस अवसर पर एक विशेष नृत्य किया जाता है, जिसे कर्मा नृत्य कहते हैं। जानकारी के अनुसार श्रद्धालु उपवास के बाद करम वृक्ष की शाखा को घर के आंगन में रोपित करते हैं। दूसरे दिन कुल देवी-देवता को नवान्न देकर ही उसका उपभोग शुरू होता है। कर्मा नृत्य को नई फ़सल आने की खुशी में लोगों द्वारा नाच-गाकर मनाया जाता है। कर्मा नृत्य छत्तीसगढ़ व झारखण्ड की लोक-संस्कृति का पर्याय भी है। छत्तीसगढ़ व झारखण्ड के आदिवासी व ग़ैर-आदिवासी सभी इसे लोक मांगलिक नृत्य मानते हैं। कर्मा पूजा नृत्य, सतपुड़ा व विंध्य की पर्वत श्रेणियों के बीच सुदूर गावों में विशेष रूप से प्रचलित है। यह दिन इनके लिए प्रकृति की पूजा का है। परम्परा के मुताबिक, खेतों में बोई गई फसलें बर्बाद न हों, इसलिए प्रकृति की पूजा की जाती है। साथ ही बहनें अपने भाइयों की सलामती के लिए इस दिन व्रत भी रखती हैं। इनके भाई ‘करम’ वृक्ष की डाल लेकर घर के आंगन या खेतों में गाड़ते हैं। इसे वे प्रकृति के आराध्य देव मानकर पूजा करते हैं। पूजा समाप्त होने के बाद वे इस डाल को पूरे धार्मिक रीति‍ से तालाब, पोखर, नदी आदि में विसर्जित कर देते हैं। झारखण्ड, बिहार, ओड़िशा पश्चिम बंगाल व छत्तीसगढ़ का यह एक प्रमुख त्यौहार है। यह त्यौहार भादो मास की एकादशी के दिन मनाया जाता है।

कर्मा पूजा की कथा…..

कर्मा व धर्मा नामक दो भाई थे। दोनों बहुत मेहनती व दयावान थे। कुछ दिनों बाद कर्मा की शादी हो गयी। उसकी पत्नी अधर्मी व दूसरों को परेशान करने वाले विचार की थी। वह धरती माँ के ऊपर ही माड़ पसा देती थी। इस कर्म को देख कर्मा बहुत दुखित हुआ। नाराज होकर वह घर से चला गया। उसके जाते ही सभी के भाग्य फूट गए, दुर्दिन आ गए व वहां के लोग दुखी रहने लगे।धर्मा से लोगों की परेशानी नहीं देखी गयी। वह भी अपने भाई को खोजने निकल पड़ा। कुछ दूर गया ही था कि उसे प्यास लग गयी। आस-पास कहीं पानी न था। काफी दूर एक नदी दिखाई दिया। वहां पहुंच कर उसने देखा की उसमें पानी ही नहीं है। नदी ने धर्मा से कहा की जबसे कर्मा भाई यहाँ से गए हैं, तबसे हमारा करम फुट गए हैं। यहाँ का पानी सुख गया है। यदि वे मिल जाएं तो उनसे कहा देना। कुछ दूर जाने पर एक आम का पेड़ मिला। उसके सारे फल सड़े हुए थे। उसने भी धर्म से कहा की जब से कर्मा गए हैं, तब से हमारे फल यूं ही बर्बाद हो जाते हैं। यदि वे मिलें तो उनसे कह दीजियेगा व उनसे उपाय पूछ कर बताइएगा। धर्म वहां से आगे बढ़ गया। उसे एक वृद्ध व्यक्ति मिला। उन्होंने बताया की जबसे कर्मा यहां से गया है, उनके सर के बोझ तब-तक नहीं उतरते जबतक 3-4 लोग मिलकर न उतारें। यह बता कर्मा से बता करा निवारण हेतु उपाय बताना । धर्म वहाँ से भी आगे बढ़ा। उसे एक महिला मिली। उसने बताई की कर्मा से पूछ कर बताना की जबसे वो गए हैं, खाना बनाने के बाद बर्तन हाथ से चिपक जाते हैं।धर्म आगे चल पड़ा। चलते-चलते एक रेगिस्तान में जा पहुंचा। वहां उसने देखा की कर्मा धुप व गर्मी से परेशान है। उसके शरीर पर फोड़े पड़े हैं। वह ब्याकुल हो रहा है। धर्म से उसकी हालत देखी नहीं गयी। उसने करम से आग्रह किया की वो घर वापस चले। कर्मा ने कहा की मैं उस घर में कैसे जाऊं, जहाँ मेरी पत्नी जमीन पर माड़ फेक देती है। तब धर्म ने वचन दिया की आज के बाद कोई भी महिला जमीन पर माड़ नहीं फेंकेगी। फिर क्या, दोनों भाई वापस घर की ओर चल पड़े। सबसे पहले वह महिला मिली। उससे कर्मा ने कहा की तुमने किसी भूखे को खाना नहीं खिलाया था इसलिए तुम्हारे साथ ऐसा हुआ। आगे कभी ऐसा मत करना, अब सब ठीक हो जायेगा। अंत में नदी मिली। कर्मा ने कहा की तुमने किसी प्यासे को साफ पानी नहीं दिया। आगे कभी किसी को गन्दा पानी मत पिलाना। इस प्रकार उसने सबको उसका कर्म बताते हुए घर आया। पोखर में कर्म का डाल लगा कर पूजा किया। उसके बाद पुरे क्षेत्र में पुनः खुशाली लोट आई। सभी आनंद पूर्वक से रहने लगे। कहते हैं की उसी की याद में कर्मा पर्व मनाया जाता है ।

यह भी है मान्यता…..

कर्मा पूजा नृत्य के साथ कई लोग इस पूजा की अधिष्ठात्री देवी ‘करमसेनी देवी ‘ को मानते हैं। जबकि कई लोग विश्वकर्मा भगवान को इसका अराध्य देवता मानते हैं। अधिकतर लोग इसकी कथा को राजा कर्म से जोड़ते हैं, जिसने विपत्ति-परेशानियों से छुटकारा पाने के बाद इस कर्मा पूजा उत्सव नृत्य का आयोजन पहली बार किया था। आदिवासी लोग कर्मवीर हैं, जो कृषि कार्य को संपन्न करने के पश्चात उपयुक्त अवसर पर यह उत्सव मनाते हैं। इस प्रकार कर्मा पूजा को लेकर और भी कई कहानियां हैं, जो सभी प्रकृति के प्रति समर्पित है।

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